“14 अप्रैल: जयंती से आगे” डॉ बालाराम परमार

14 अप्रैल का दिन कैलेंडर पर सिर्फ एक तारीख नहीं है। यह डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती है। हर साल इस दिन महू , अम्बेडकर नगर, दिक्षा भूमि नागपुर और चैत्यभूमि दादर, मुंबई में लाखों मालाएँ चढ़ाई जाती हैं। जुलूस निकलते हैं, भाषण होते हैं। लाखों अनुयाई तस्वीर और स्टेचू खरीद कर घर लाते हैं और श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करते हैं।

आस्था, श्रद्धा, भक्ति और उनके द्वारा डिप्रेस्ड समाज को संविधान के माध्यम से दिलाए गये अधिकारों के बदले कृतज्ञता प्रकट करना समझ में आती है।

लेकिन 21वीं सदी के छब्बीसवें वर्ष में बाबा साहेब को चाहने वाले क्या यहीं रुक जाएँ? 2026 के भारत में 14 अप्रैल का मतलब ‘जयंती मनाने’ से आगे बढ़कर ‘अंबेडकर को सही अर्थों में समझ कर ‘जीवन जीने’ तक ले जाना होगा! वक्त का तकाजा है कि भारत के लोग बाबा साहब को युग पुरुष के रूप में समझें और उनकी शिक्षा की मंशानुरूप जीएं ।


आधुनिक भारत को मुख्य रूप से भारत ,इंडिया
हिन्दुस्तान भारत गणराज्य
भारतवर्ष आर्यावर्त,जम्बूद्वीप, भारतखंड और सोने की चिड़िया जैसे नामों से पुकारा जाता है।

1947 में आज़ादी के समय भारत एक गरीब और कृषि पर निर्भर देश था। पिछले आठ दशकों में भारत ने कृषि, अर्थव्यवस्था, विज्ञान और बुनियादी ढांचे में अभूतपूर्व प्रगति की है।

अर्थव्यवस्था और विकास के क्षेत्र में भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत अब यूपीआई और डिजिटल पेमेंट में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है।

1960 के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति के फलस्वरूप भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर है। भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है।

भारत ने 1975 में अपना पहला उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ लॉन्च किया था। आज भारत मंगलयान के जरिए पहले प्रयास में मंगल तक पहुँचने वाला और चंद्रयान-3 के जरिए चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाला पहला देश है। शक्ति में भारत एक परमाणु संपन्न राष्ट्र है ।


भारत का सड़क नेटवर्क 1951 के 0.4 मिलियन किमी से बढ़कर अब 5.2 मिलियन किमी से अधिक हो गया है, जो दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क में से एक है।


1947 की तुलना में बिजली उत्पादन क्षमता बढ़कर 4,25,000 मेघा वाट हो गई है। लगभग सभी गाँवों का विद्युतीकरण हो चुका है।
सामाजिक सुधार देखने को मिल रहा है। साक्षरता दर 75 प्रतिशत हो गई है। स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के कारण औसत आयु 32 वर्ष से बढ़कर अब 71 वर्ष हो गई है। भारत को अनेक बीमारियों को पूरी तरह जड़ से खत्म करने में सफलता मिली है।


इन उपलब्धियों के बावजूद, भारत का अनुसूचित जाति जनजाति वर्ग बाबा साहब की जयंती पर युवाओं को बताता है कि हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था के चलते हमारे गले में कटोरा बांधने के लिए मजबुर किया जाता था। हमें जमीन पर थूकने तक नहीं दिया जाता था। हमारे पूर्वज चलते थे तो पीछे झाडू बांधते थे। तालाब में नहाने नहीं दिया जाता था।

इसलिए अब हमें ब्राह्मणवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है। जबकि भारत में तो संसदीय शासन प्रणाली है। जयंती के अवसर पर अनेक लोग यह कहते हुए दिखाई देंगे कि जिस धर्म में समानता का दर्जा नहीं दिया जाता , उस का त्याग करना चाहिए। एक बानगी देखें ।
एक कविता में लिखा हुआ मिलता है कि “एजुकेट हुआ है बेटा मेरा, अब वो सवाल भी करता है। वो पूछता है संविधान से, अनुच्छेद 17 ज़िंदा है या मुर्दा है?”

आज के दिन ऐसा कहने से पहले सोचना है कि यह अनुच्छेद अंबेडकर के द्वारा ही संविधान में समावेश किया है। इसी कविता में लिखा हुआ है कि “मैं थूकता हूँ ऐसी आज़ादी पर” , मैं कहता हूँ: “मैं गढ़ता हूँ वैसी आज़ादी को” , जहाँ थूकने की नौबत न आए, जहाँ हर थाली में रोटी और इज्ज़त साथ आए।”

ऐसी ही विरोधाभासी विचारधारा से प्रेरित होकर आज के युवा अंबेडकर जयंती पर मनुस्मृति को जलाने और धर्म ग्रंथों, देवी देवताओं के अपमान करने की चेष्टा करते हैं।


बाबा साहेब की जयंती मनाना बहुत ही गर्व का विषय है। किसी भी महापुरुष को याद करना समाज को दिशा देता है। विचारणीय विषय तब बनता है , जब अनूसुचित जाति जनजाति के अधिकांश पढ़ें लिखे जयंती पर बाबा साहबा की मूर्ति की पूजा करते हैं। जबकि बाबासाहेब खुद व्यक्ति-पूजा के खिलाफ थे। बाबा साहब के द्वारा ग्रहण किए गए धर्म में भी मूर्ति पूजा निषेध है। मूर्ति पूजा के विरोध में 19 मार्च 1955 को राज्यसभा में उन्होंने कहा था, “…. मैं संविधान जलाना चाहता हूं… वजह यह है कि हमने एक भगवान के आने और रहने के लिए एक मंदिर बनाया, लेकिन भगवान के स्थापित होने से पहले, अगर शैतान ने उस पर कब्जा कर लिया, तो हम मंदिर को नष्ट करने के अलावा और क्या कर सकते थे”? उनका इशारा व्यक्ति पूजा की ओर था।


महापुरुषों को पूजाघर में बंद कर देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें कर्म में उतारना जरूरी है। इसलिए 14 अप्रैल को हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या 13 अप्रैल से पहले और 15 अप्रैल के बाद हमारे व्यवहार में अंबेडकर दिखते हैं? अगर नहीं, तो जयंती अधूरी है।
उनकी विद्वता अद्वितीय है। संविधान सभा सदस्य टी. टी. कृष्णमाचारी ने भी माना था कि संविधान को लिखने का भार डॉ. आंबेडकर के कंधे पर था।

2026 की 135वीं जयंती के अवसर पर समस्त देशवासियों को याद दिलाया जाता है कि बाबा सहाब का काम संविधान लिखकर और धर्म परिवर्तन कर खत्म नहीं हुआ है ? हिंदू कोड बिल लाकर उन्होंने महिलाओं को संपत्ति, तलाक और गोद लेने का अधिकार दिलाया । श्रम मंत्री रहते हुए 8 घंटे काम, मातृत्व लाभ, कर्मचारी राज्य बीमा योजना जिससे प्राइवेट कर्मचारियों को चिकित्सा सुविधा प्रदान होती है । रिजर्व बैंक की नींव उनकी किताब ‘रुपए की समस्या: उद्भव और समाधान’ पर रखी गई। नदी घाटी परियोजना और जल और बिजली नीति उनकी प्रमुख देन हैं।

वर्तमान पीढ़ी को ”शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” के आगे उनके अन्य ध्येय वाक्य: “जीवन लंबा होने के बजाय महान होना चाहिए, मन की स्वतंत्रता ही वास्तविक स्वतंत्रता है और
हम सबसे पहले और अंत में भारतीय हैं।” आदि संदर्भों को भी ‘जयंती से आगे’ जानना है। चेत्यभूमी, दीक्षाभूमि से भी चार क़दम आगे सोचना है। भारत रत्न अम्बेडकर का मतलब सिर्फ 26 नवंबर 1949 यानी संविधान पूरा होने की तारीख तक सीमित नहीं रखना है।
जयंती पर उन्हें जन्म से लेकर 1956 के महापरिनिर्वाण तक की अनुकरणीय यात्रा को उनके सामाजिक , आर्थिक, शैक्षिक ,वैधानिक, वैज्ञानिक, और विदेश नीति तक जाना और समझना होगा।

‘ डिग्री से आगे, तर्क तक’ विचार करना है। आज भारत में स्कूल नामांकन 95% से ऊपर है। पर क्या वंचित वर्ग इस प्रतिशत तक शिक्षित हुए हैं? अंबेडकर के लिए शिक्षा का मतलब था तर्क, विज्ञान और नैतिकता। शिक्षा उनके लिए सत्ता नहीं, सेवा थी। इस संदर्भ में 14 अप्रैल से आगे जाने का मतलब होगा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान कक्षा पांच तक के बच्चों में पढ़ने, लिखने और बुनियादी गणित की समझ विकसित करना होगा । आदतन यह न कहें कि यह काम सरकार का है? शिक्षक होने के नाते मैं ऐसा समझता हूं कि बाबा साहब कि मंशा अनुसार बालक को शिक्षित करना प्रत्येक माता-पिता और सामाजिक संस्थाओं का भी कर्तव्य है।


निपुण भारत मिशन के तहत, 2027 के अंत तक प्रत्येक 3 साल और उसके ऊपर के बच्चों को साक्षर बनाना है। डॉ अम्बेडकर की शिक्षा नीति ‘शिक्षित बनो ‘ को वास्तविकता में बदलेने का सुअवसर है। बाबा साहब के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
इस संदर्भ में पच्चहतर साल पहले अंबेडकर ने कहा था: “शिक्षा शेरनी का दूध है। जो पियेगा वो दहाड़ेगा।” शिक्षा रुपी शेरनी का दुध पीना है और कर्त्तव्य का पालन करते हुए अधिकारों के लिए दहाड़ना है। घर घर शोर की दहाड़ से आगे, संवाद तक
ले जाने की आवश्यकता है। अंबेडकर जी ने महाड़ सत्याग्रह किया, पर हिंसा नहीं की। उन्होंने गोलमेज सम्मेलन में बहस की, सड़क जाम नहीं किया। उनके लिए मनोदृष्टि का मतलब था संवैधानिक तरीकों से अन्याय को चुनौती देना।


2026 ‘जयंती से आगे’ से मेरा तात्पर्य है सोशल मीडिया पर गाली गलौज के स्थान पर सुधारात्मक लेख पोस्ट करना। आवेग में आकर सड़क पर उतरने से पहले भला बुरा सोचना। मनुस्मृति को जलाने की सोचने से पहले उसे पढ़ना।
संविधान कहता है कि आपकी स्वतंत्रता वहीं खत्म होती है जहाँ दूसरे की नाक शुरू होती है। इसलिए संघर्ष का मतलब है अपनी बात रखना, पर दूसरे की सुनना भी। भीड़ से आगे, समाज तक जाना होगा। संगठित होने का मतलब भीड़ जुटाना नहीं है। अंबेडकर जी ने शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन बनाया, उसका लक्ष्य पूरे शोषित समाज को जोड़ना था। लेबर लीडर के रूप में उन्होंने कहा था,”मैं पहले भारतीय हूँ और अंत में भी भारतीय।”


आज 14 अप्रैल से आगे जाने,के संबंध में मेरा आग्रह रहेगा कि जातिगत संगठन से आगे बढ़कर ज्वलंत मुद्दों पर आधारित संगठन बनाना। पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे विषयों पर जब सारा गांव और शहर आरक्षण की दीवार तोड़ कर सम्पूर्ण जनमानस के साथ खड़े होंगे तब एकता और समरसता का नजारा देखते ही बनेगा। तब अंबेडकर जी का ‘संगठित बनों’ का सपना पूरा होगा। गांव की चौपाल, विद्यालय प्रबंधन समिति में जब , मजदूर और अधिकारी , शिक्षक के साथ एक टेबल पर बैठेंगे और ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ भाव को समझने का प्रयास करेंगे तब समझिए 14 अप्रैल सफल हुआ।

14 अप्रैल के लिए हमारा असली संकल्प क्या हो?

आओ प्रतिज्ञा लें कि अगली 14 अप्रैल तक हम कम से कम दो ऐसी आदतें बदलेंगे जो हमारे व्यवहार से संविधान की भावना के खिलाफ है। भाईचारे के खिलाफ है समरसता के खिलाफ है ।

वही सच्ची जयंती होगी। क्योंकि अंबेडकर को फूल नहीं,समानता , न्याय , बंधुत्व के फल चाहिए , और ये फल स्टेचू पर माला चढ़ाने ,फोटो खिंचवाने से नहीं, मेहनत से उगते हैं। इसलिए इस बार का 14 अप्रैल जयंती से आगे, बाबा सहाब के जुझारू जीवन तक।अब जरूरत है ‘स्टेटस ऑफ इक्वलिटी’ की। 14 अप्रैल मनाना आसान है। मुश्किल है 15 अप्रैल को बस में महिलाओं -बुजुर्गो को सीट देना, ऑफिस में जाति न पूछना, और फाइल पर बिना रिश्वत साइन करना।

डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख


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