बंगाल चुनाव: 3.5 लाख जवान तैनात, 90 लाख फर्जी वोटर बाहर

गृह मंत्रालय द्वारा बुधवार को पश्चिम बंगाल में केन्द्रीय सशस्त्र बलों की 150 अतिरिक्त कंपनियां तैनात करने का निर्णय लिया गया है।

इसके पूर्व 2400 कंपनियां तैनात की जा चुकी है। अब 150 अतिरिक्त कंपनियो की तैनाती से यह संख्या 2550 तक पहुंच गई है। एक कंपनी में 135 सैनिक होते हैं। यानी पश्चिम बंगाल में भय रहित चुनाव आयोजन हेतु केन्द्र सरकार को लगभग 3,50,000 जवान भेजना पड़ रहे हैं!

दूसरी ओर SIR की प्रक्रिया जो कि अन्य सभी राज्यों में सरलता, सहजता और समयबद्ध तरीके से संपन्न हो गई, पश्चिम बंगाल में स्थानीय सरकार और प्रशासन के अत्यन्त असहयोगात्मक रवैए की वजह से अब तक शत प्रतिशत सम्पूर्ण नहीं हो पाई है। एक तरह से ममता द्वारा एडी चोटी का जोर लगा लिया गया कि किसी तरह यह प्रक्रिया रुक जाए और पुरानी मतदाता सूचियों के आधार पर ही मतदान हो जाए। इसके लिए पहले तो उन्होंने प्रक्रिया हेतु आवश्यक अधिकारी ही निर्वाचन आयोग को उपलब्ध नहीं कराए। फिर स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में वकील के रूप में पहुंच कर न्यायाधीशों पर दबाव बनाने के प्रयास भी किए ताकि सर्वोच्च न्यायालय प्रक्रिया को रोककर पुरानी सूची के आधार पर मतदान के आदेश जारी कर दे। परन्तु न्यायालय ने कठोर रुख अपनाते हुए उन्हें ही फटकारा और एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए बंगाल के प्रशासन के स्थान पर बंगाल उच्च न्यायालय के न्यायिक अधिकारियों को SIR प्रक्रिया हेतु नियुक्त कर दिया। यही नहीं, जब चुनाव आयोग को अतिरिक्त अधिकारियों की आवश्यकता पड़ी तब सर्वोच्च न्यायालय द्वार झारखण्ड और उड़ीसा के न्यायिक अधिकारियों को भी इस कार्य हेतु नियुक्त कर दिया गया। कुल मिला कर लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों द्वारा मिल कर इस कार्य को अंजाम दिया गया।

ये है ममता बनर्जी की कार्यप्रणाली! 15 वर्षों तक जिस राज्य पर उन्होंने निर्बाध शासन किया उस राज्य में भय रहित, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव संपन्न करने के लिए चुनाव आयोग उनकी पुलिस पर विश्वास नहीं रख पाता और केन्द्र से 350000 जवान बुलवाने पड़ते हैं। वहीं सर्वोच्च न्यायालय को, SIR जैसी सामान्य प्रक्रिया के अनुपालन हेतु तीन प्रदेशों के न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त करना पड़ता है।

इससे स्पष्ट होता है कि पश्चिम बंगाल के प्रशासन, अधिकारियों और पुलिस की छवि घोर पक्षपाती की हो चुकी है। ममता के नेतृत्व में TMC के गुंडों द्वारा बंगाल के जनमानस में जो खौफ पैदा कर दिया गया था वह संभवतः और किसी राज्य में कभी नहीं हुआ। आम आदमी को मतदान के लिए बाहर निकलने ही नहीं दिया जाता था। भारी संख्या में अवैध घुसपैठिए जो कि TMC की छत्रछाया में ही पल बढ़ रहे थे, सामान्य या मृत मतदाताओं के नाम पर TMC के पक्ष में मतदान करते थे। चुनाव के पूर्व, चुनाव के दौरान और चुनाव के पश्चात हिंसा के दौर बेखौफ चलते थे। इसीलिए ममता को SIR की प्रक्रिया नहीं चाहिए थी। SIR से बंगाल के लगभग 7 करोड़ मतदाताओं में से 90 लाख मतदाता कम हो चुके हैं। 27 लाख मतदाताओं के नाम अब भी जांच के घेरे में हैं। इस प्रकार कुल 1 करोड़ 17 लाख मतदाता कम होने की संभावना है। इनमें लाखों हैं जिन्हें ममता राज में बांग्लादेश से घुसा कर मतदाता सूचियों में जोड़ लिया गया था। इसी प्रकार लाखों वो भी हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जो स्थाई रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं। इन्हीं के नाम पर TMC के गुंडे मतदान करते आ रहे थे।

दूसरी और केन्द्रीय बलों की प्रचण्ड उपस्थिति के चलते जाली मतदान और सामान्य मतदाता को धमकाने डराने की संभावना भी काफी कम हो गई है। कोलकाता में यह देखने में आया कि बड़ी बहुमंजिला इमारतों के दरवाजों पर TMC के गुंडे मतदान के दिन खड़े होकर किसी को बाहर निकलने ही नहीं देते थे। इस बार निर्वाचन आयोग द्वारा ऐसी बहुमंजिली इमारतों के प्रांगण में ही मतदान केन्द्र बना दिए हैं। इन सभी उपायों के चलते प्रबल संभावना है कि दशकों बाद बंगाल में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव हो पाएंगे।

बहरहाल, यह तो कहा ही जा सकता है कि ममता और TMC के लम्बे शासन के बाद सर्वोच्च न्यायालय और निर्वाचन आयोग बंगाल के तन्त्र पर रत्ती भर विश्वास करने की स्थिति में भी नहीं है। किसी मुख्यमंत्री के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक स्थिति क्या हो सकती है?

श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर


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