मन चंगा तो कठौती में गंगा: आंतरिक शुद्धता ही समरस समाज का आधार

लेखक: श्री राजेश कुमरावत ‘सार्थक’

भारतीय संत परंपरा ने सदैव समाज को भीतर से जोड़ने और उसे एकात्मता की डोर में बांधने का कार्य किया है। जब-जब समाज बाहरी आडंबरों, ऊंच-नीच और जातिगत भेदभाव में उलझा, तब संतों ने आत्मा की शुद्धता और मानवीय समानता का संदेश देकर उसे नई दिशा दी। इसी उज्ज्वल परंपरा में संत रविदास का जीवन और उनकी वाणी आज भी सामाजिक समरसता के लिए एक प्रखर प्रकाशस्तंभ के रूप में हमारे सामने खड़ी है।

“मन चंगा तो कठौती में गंगा” – यह वाक्य केवल एक आध्यात्मिक अनुभूति का संकेत नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का गूढ़ सूत्र है। उस समय जब समाज जन्म और जाति के आधार पर विभाजित था, तब संत रविदास ने इस एक पंक्ति के माध्यम से यह स्थापित किया कि पवित्रता किसी बाहरी व्यवस्था या कर्मकांड की मोहताज नहीं, बल्कि वह मन की निर्मलता में निवास करती है।
यह विचार उस युग में एक मौन क्रांति के समान था- एक ऐसी क्रांति, जिसने समाज के जड़ हो चुके भेदभावों को चुनौती दी।

संत रविदास का संपूर्ण जीवन इस सिद्धांत का जीवंत उदाहरण है। वे साधारण परिवेश में जन्मे, किन्तु उनके भीतर की साधना, सेवा और समर्पण ने उन्हें असाधारण बना दिया। उनके सत्संग में हर वर्ग, हर समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के एकत्र होते थे। वहां न कोई ऊंचा था, न कोई नीचा – सिर्फ मानवता का विस्तार था।
यह केवल आध्यात्मिक समागम नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का एक प्रयोग था, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

यदि हम इस विचार को गहराई से समझें, तो पाएंगे कि संत रविदास ने समाज को बाहरी सुधारों से अधिक भीतरी परिवर्तन की ओर प्रेरित किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जब तक मन में भेदभाव है, तब तक बाहरी समानता का कोई भी प्रयास अधूरा रहेगा। अतः समाज में स्थायी परिवर्तन लाने के लिए व्यक्ति के अंतर्मन का शुद्ध होना अनिवार्य है।

वर्तमान समय में, जब एक ओर भारत विश्व मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है, वहीं दूसरी ओर समाज के भीतर जातिगत तनाव और विभाजन की छोटी-छोटी रेखाएं खींचने के प्रयास भी दिखाई देते हैं। ऐसे समय में संत रविदास का यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है कि समाज की वास्तविक शक्ति उसकी समरसता में निहित है, न कि विभाजन में।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम संत रविदास के इस विचार को केवल स्मृति तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने व्यवहार, सामाजिक संबंधों और जीवन दृष्टि में उतारें। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर से भेदभाव को समाप्त करने का संकल्प ले, तो समाज में समरसता का एक नया अध्याय लिखा जा सकता है।


संत रविदास का यह संदेश केवल धार्मिक या आध्यात्मिक नहीं, बल्कि एक सशक्त सामाजिक दर्शन भी है। यह हमें सिखाता है कि सच्चा धर्म वही है, जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है, न कि उसे विभाजित करता है।
सार्थक चिंतन: जब मन निर्मल होता है, तब समाज स्वतः समरस बनता है। बाहरी परिवर्तन तभी स्थायी होते हैं, जब उनका आधार अंतर्मन की शुद्धता हो । क्रमशः ..


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *