
भारतीय इतिहास केवल राजाओं और साम्राज्यों की गाथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत वीरों के त्याग और बलिदान से भी बना है, जिनका नाम समय की धूल में कहीं दब गया। ऐसे ही एक अद्भुत, किंतु उपेक्षित नायक थे भील राजा वैगड़ा जी।
सोमनाथ मंदिर, जो भारत की आस्था, संस्कृति और आत्मा का प्रतीक है, सदियों से आक्रमणकारियों का निशाना रहा। यह केवल पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता का जीवंत प्रतीक था। इतिहास में कई बार इस मंदिर को तोड़ने के प्रयास हुए, जिनमें से एक घटना लगभग 1401 ईस्वी के आसपास की मानी जाती है, जब सुल्तान जफर खां (मुजफ्फर शाह प्रथम) ने सोमनाथ पर आक्रमण का निश्चय किया। उस समय देश की राजनीतिक स्थिति अत्यंत कमजोर थी। कोई संगठित सेना या सशक्त शासन व्यवस्था सोमनाथ की रक्षा के लिए उपलब्ध नहीं थी। किंतु जब राज्य शक्तियाँ कमजोर पड़ जाती हैं, तब समाज के भीतर से ही वीरता जन्म लेती है।
इसी समय उभरे जंगलों के स्वाभिमानी, न्यायप्रिय और पराक्रमी शासक वैगड़ा जी भील।
जंगलों का योद्धा, धर्म का रक्षक
भील समाज सदियों से प्रकृति का रक्षक रहा है। उनका जीवन जंगलों से जुड़ा है, और वहीं से उन्होंने युद्ध की अद्भुत कला सीखी। वैगड़ा जी न केवल एक वीर योद्धा थे, बल्कि वे छापामार युद्ध (गोरिल्ला वारफेयर) के अद्वितीय ज्ञाता भी थे। उनकी रणनीति सरल लेकिन प्रभावशाली थी पेड़ों पर छिपकर तीर चलाना, दुश्मन को संकरे मार्गों में फंसाना, और चारों ओर से अचानक आक्रमण करना। जब सुल्तान की विशाल सेना सोमनाथ की ओर बढ़ रही थी, तब वैगड़ा जी ने बिना विलंब अपने आदिवासी योद्धाओं को संगठित किया और प्रतिज्ञा ली
“जब तक शरीर में रक्त की अंतिम बूंद है, कोई भी आक्रांता सोमनाथ के गर्भगृह तक नहीं पहुंचेगा।”
असंभव के विरुद्ध युद्ध
एक ओर हजारों प्रशिक्षित सैनिकों, घुड़सवारों और हाथियों से सुसज्जित सेना थी, और दूसरी ओर मुट्ठी भर जनजाति योद्धा। लेकिन युद्ध केवल संख्या से नहीं, बल्कि साहस और रणनीति से जीता जाता है।
जंगलों में छिपे भील योद्धाओं ने ऐसा भयंकर आक्रमण किया कि दुश्मन की सेना हिल उठी।
तीरों की वर्षा, अचानक हमले, और हर दिशा से घेराबंदी यह युद्ध शैली सुल्तान की सेना के लिए बिल्कुल नई थी। घंटों तक संघर्ष चलता रहा। हर बार जब सेना आगे बढ़ती, वैगड़ा जी के योद्धा उसे पीछे धकेल देते।
केसरिया और अंतिम बलिदान
लेकिन अंततः संख्या बल भारी पड़ने लगा। दुश्मन की नई टुकड़ियाँ आती रहीं, और भील योद्धा थकते और घायल होते गए। इस निर्णायक क्षण में वैगड़ा जी और हमीर जी गोहिल ने “केसरिया” धारण किया एक ऐसा संकल्प जिसमें योद्धा जानते हैं कि वे लौटेंगे नहीं, फिर भी पीछे हटने से इनकार करते हैं। सोमनाथ मंदिर की सीढ़ियों पर अंतिम युद्ध लड़ा गया।
हर सीढ़ी पर खून बहा, हर कदम पर एक वीर गिरा। और अंततः, वैगड़ा जी भील वीरगति को प्राप्त हुए।
स्त्रियों का अद्वितीय साहस
इस युद्ध की एक और मार्मिक तस्वीर उन वीरांगनाओं की है, जिन्होंने अपने पतियों को रणभूमि के लिए विदा करते हुए कहा:
“यदि एक पल का सुहाग भी महादेव के काम आ जाए, तो हमारा जीवन धन्य हो जाएगा।”
यह केवल युद्ध नहीं था, यह संपूर्ण समाज का समर्पण था। इतना महान बलिदान होने के बावजूद, वैगड़ा जी भील का नाम आज न तो पाठ्यपुस्तकों में मिलता है, न ही किसी बड़े सरकारी स्मारक में। सोमनाथ आज भी खड़ा है केवल पत्थरों के सहारे नहीं, बल्कि उन वीरों के बलिदान के कारण जिन्होंने अपनी जान देकर उसकी रक्षा की। वैगड़ा जी भील का बलिदान यह संदेश देता है की भारत की रक्षा केवल महलों के राजाओं ने नहीं, बल्कि जंगलों के वीर पुत्रों ने भी की है।
लेखक : निलेश कटारा

