महा लोक आनुष्ठानिक पर्व – गणगौर

डॉ. सुमन चौरे, लोक संस्कृतिविद्, भोपाल

नौ दिनऽ की गणगौर म्हारा साहेबाऽ
रमणऽ जासोऽ वाड़ी मऽ
खोलो भरी नऽ फुलड़ पाती लावसाऽ
रनु बाई का संगऽ रमसाऽ जीऽ
कुआ बावड़ी बाग़ऽ बगीचाऽ
नौ दिन झालरियाँ दीसाँ जीऽ

भावार्थ – नौ दिन गणगौर माता का पर्व है| हे स्वामी, हम बाड़ी में पाती खेलने जायगे| हम रनु बाई के संग बाग़ बगीचा कुआ बावड़ी पर झालरियाँ देंगे और अपनी आँचल में फूल पाती लेकर आएंगे।
‘रनु बाई’-‘धणियर राजा’ संबंधित उद्बोधन करते हुए ऐसे अनेकों लोकगीत आपको सुनाई देंगे मध्यप्रदेश के महा लोकपर्व गणगौर पर।

गणगौर का आयोजन मध्यभारत के निमाड़, मालवा, भुवाणा आदि क्षेत्रों में विविध स्वरुपों में किया जाता है। निमाड़-मालवा मध्यप्रदेश के दक्षिण-पश्चिम में स्थित भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्र है। ‘गणगौर’ शिव-गौरी का आनुष्ठानिक पर्व है, जहाँ इनको रनुबाई-धनियर राजा के रूप में सम्बोधित करते हैं| यह नौ दिवसीय शक्ति आराधना पर्व है| चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की दसमी से लेकर चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तीज तक गणगौर पर्व अगाध आस्था और श्रृद्धा से मनाया जाता है| कुछ क्षेत्रों में ग्यारस से चौथ तक नौ दिनों पर्व मनाते हैं। जिन स्थानों पर विशेष मानता के अनुसार गणगौर पर्व मनाया जाता है वहाँ वैशाख मास में भी यह अनुष्ठान होता है।

शास्त्रोक्त पद्धति से देवी का आवाहन मंत्रोच्चार और स्तोत्रों के पाठन द्वारा किया जाता है। गणगौर लोक अनुष्ठान में देवी का आवाहन करने के लिए पारम्परिक लोकगीत गाये जाते हैं। इन भावपूर्ण लोकगीतों के माध्यम से देवी का वंदन-अर्चन-पूजन किया जाता है। शुचिता और पवित्रता का पूरा ध्यान गणगौर में रखा जाता है। यह एक बृहत सामूहिक अनुष्ठान होता है।

निमाड़ी बोली में गौर का अर्थ सखी या सहेली होता है और गण अर्थात् लोक। यही आशय है इस पर्व का। जो गण की गौर हो वही गणगौर| यह लोक की सखी रना देवी है। निमाड़ी में देवी या माँ को बाई कहते हैं, इसलिए रना देवी को रनुबाई कहते हैं। रनुबाई के पतिदेव धणियर राजा हैं। इन्हें लोकगीतों में रनुबाई और धनियर राजा, गौरबाई-ईश्वर राजा, लछ्मीबाई-विष्णु राजा, सईतबाई-बिरमा राजा, रोहेणबाई-चंद्रमा राजा कहा जाता है।
गणगौर में देवी राजमहल की देवी नहीं है| न मंदिर में विराजमान देवी है वह तो मात्र जन-जन के साथ रहने वाली रमण करने वाली देवी है इसलिए इसे लोकदेवी मानते हैं| देवी के माँ, बहन, पत्नी, बेटी सभी रूप का वर्णन मिलता है| लोक मान्यता है कि देवी इन नौ दिनों के लिए अपने ससुराल से मायके आई है। लोक और देवी में इन्हीं से संबंधित भावों को अनुभूत किया जाता है।

गणगौर अनुष्ठान में देवी का स्वरूप जवारे के रूप में रहता है। कुरकई (छोटी बाँस की टोकनी) में शुचिता के साथ माटी भरकर उसमें गेहूँ बोये जाते हैं। इस पूजन पद्धति में सहज सरल भाव से जवारे सिंचन कर ही देवी की आराधना पूरी होती है। भोला लोक, जीवन के सभी आयामों में देवी-देवता को अपने जैसे ही समझता है। अतः यहाँ खेती में गेहूँ बोते हैं धणियर राजा (शिव) और कृषि कर्म में सहयोगी होती हैं उनकी पत्नी रनुबाई (पार्वती)। एक लोक-गीत के भाव हैं –


भोळा धणियर राजा घरऽ वाया जागऽ
रनुबाई सींचऽ लियाऽ
राणीऽ सींचीऽ नऽ जाण्या हो,
जवाराऽ पेळा पड़्या

बोनी के साथ फसल बड़ी होती है, तब उसकी सार-सम्हाल देख-रेख की ज्यादा सावधानी रखनी पड़ती है। गीत आगे बढ़ता है-

उच्चो मयड़ो रेऽ व्हाऽ रेऽ
हिरणऽ राजाऽ जवऽ चरऽ
धणियर बाणऽ साधो रेऽ
तुमरा खेतऽ विणसियाऽ
हमऽ नी साधाँऽ रेऽ
म्हारी माँयऽ सावलड़ी
ववूऽ हो पातलड़ी
बईणऽ सुभद्रा बाई सासऽराऽ
भावार्थ – ऊँची भारी जमीन पर जौ की खेती लहलहा रही है। उस जौ को हिरण चरकर नष्ट कर रहे हैं। रनु बाई कहती हैं, हे धणियर! तुम बाण साधकर हिरण भगा दो। इस पर धणियर कहते हैं, ‘‘हम बाण नहीं साधेंगे और न ही जौ चरते हिरणों को भगाएँगे। हमारी माँ भोळीभाली है। हमारी पत्नी सुकुमारी कोमल है और बहन सुभद्रा ससुराल में है।

इस गीत में धणियर जहाँ अपने परिवार के प्रति संवेदनशील है, वहीं पशु पक्षी के प्रति भी उतने ही दयावन्त हैं। वे सोचते हैं, खाते हुए हिरण को भगाना पाप का कारण है।

मातृ रूप में देवी का पूजन नियमित होता है। देवी की सेवा, पूजा, अर्चना आदि समय महिलाएं हाथ में मात्र फूल-पत्ते लिए खड़ी रहती हैं। –
खोळऽ भरी पाती लाई म्हारी माँयऽ
अम्बा का वन्दऽ सीऽ
खोळऽ खोळऽ ओ जगजन्ती माँयऽ
थाराऽ दरसन की बलिहारी म्हारी माँयऽ
अम्बा का वन्दऽ सीऽ
भावार्थ – मैं अपने आँचल में आम्रवृक्ष की पाती भरकर लाई हूँ। हे माँ! आज अपनी किवाड़ी खोलकर मुझे दर्शन दो। आपके दर्शन से मेरा उद्धार होगा।

कन्या (देवी) भी अपने पिता के बाग बगीचों में रमना चाहती है। जब रनुबाई को ससुराल से लेने आते हैं, तो वह अपने पिता से अरज करती है कि उसे अभी ससुराल मत भेजो। उसके अभी खेलने के दिन हैं। देवी का ससुराल तो स्वर्ग में है और उसका पीहर धरती के किसान के घर है। अतः अरज करती है –
म्हारा बापऽ का कुँआ वावड़ी
हमऽ भी पाती खेलाँ हो
पिताजी हमराऽ आजा का बागऽ बगीचा
हमऽ भी पानी खेलाँग हो
झालरियो दऽ
भावार्थ – हे पिताजी! आप के बाग बगीचे हैं। खेत बाड़ी हैं, कुआँ बावड़ी हैं, हम फूल पाती खेलेंगे। हमें ससुराल मत भेजो। कुआँ बावड़ी हैं, हम अपनी सखियों के साथ जल किलोल करेंगे।

लोक चैत्र मास में देवी को बेटी के रूप में बुलाते हैं। गेहूँ की फ़सल पक कर चैत्र में घर आ जाती है। गृह स्वामिनी कहती है, ‘‘स्वामी!, अपने घर रनुबाई और धणियर राजा आयँगे, तो उनके बैठने के लिए श्रेष्ठ उत्तम आसन बनाना है। गीत का अंश है –
बाड़ी मँऽ को चन्दनऽ कटाड़ो रेऽ
म्हारा मानऽ गुमानी डोलाऽ
जेखऽ सुतार्या घरऽ राळो रे
जेऽ परऽ रनुबाई बठाड़ो रेऽ
रनुबाई अकेला नी बठऽ रेऽ
जेऽ परऽ धणियर राजा बठाड़ो रेऽ
म्हाराऽ मानऽ गुमानी डोलाऽ

भावार्थ – हे मेरे स्वामी! तुम अपनी बाड़ी में लगा चन्दन वृक्ष कटवा लो और सुतार से कहो कि वह उसका सुन्दर आसन बना दे। उसको कुम्कुम से सजा दो। उस पर रनुबाई को बैठायँगे। रनुबाई अकेली नहीं बैठेंगी, साथ में धणियर राजा को भी बैठायँगे। हमारी रनुबाई बेटी अपने स्वामी सहित नौ दिन के लिए आ रही हैं। आनन्द का पारावार नहीं होगा।

लोकजीवन इतना सहज सरल होता है कि उसकी चेतना में उसके देवी देवता भी उसी सरीखे किसान, मजदूर और कृषि कर्म में निरत रहते हैं। इसी भाव का यह गीत है। किसान अपने हरे भरे खेतों की रात-रात भर रखवाली करने जाता है। यहाँ भी यही भाव है कि पति रात में खेत पर अकेले हैं, तो पत्नी को चिन्ता में नींद नहीं आती और उसे भूख भी नहीं लगती। इसी भाव का गीत है –
वाड़ऽ वाया वाड़ुला म्हारा भवरा रेऽ
वाड़ी मँऽ जायगाऽ कूणऽ
जासे धणियर पातळा म्हारा भवरा रेऽ
रनुबाई अन्नऽ नी खायऽ
भावार्थ – धणियर ने गन्ने की बाड़ (बाड़ी) लगाई है। उसकी रखवाली करने धणियर स्वयं गये हैं। रात को हिंसक पशुओं की याद आती है तो रनुबाई को पति की चिन्ता होती है। ऐसी स्थिति में वे न तो अन्न खाती हैं और, न पानी पीती हैं, और रात भर जागती रहती हैं।
इस गीत में नारी सुलभ चेतना, पति की चिन्ता, एक कृषक पत्नी का सीधा सादा स्वभाव, चित्रित है।
प्रस्तुत गणगौर गीत कृषक-महिला की अभिलषित वांछनाओं को दिग्दर्षित करता है। वह देवी-देवताओं की आराधना करती हुई माँगती है अपने सुखी-सुसमृद्ध जीवन की भिक्षा और कृषिकर्म में सहयोगी गोधन की ठानऽ। एक गीत देखिए –
पूजणऽ वाळई काई माँगऽ
दूधऽ पूतऽ आह्वात माँगऽ
टोंगळ्या उडंतो गोबरऽ माँगऽ
पोयच्या उड़ंतो गोरसऽ माँगऽ
दासी को पीस्यो माँगऽ ववूऽ को राँध्यो माँगऽ
दीयऽ को परोस्यो माँगऽ।
भावार्थ – देवी को पूजने वाली क्या माँगती है। वह रना देवी से दूध, पूत, आह्वात अर्थात् अखण्ड सौभाग्य तथा पुत्र पौत्र माँगती है। उसके घुटने धँस जायँ, इतना गोबर और पाँचों उँगलियाँ और पूरा हाथ घी दूध में डूबे रहें। अर्थात् अकूत गोधन माँगती है, गोबर से खाद हो और पशु खेती में काम करें। साथ ही दासी द्वारा पीसा हुआ तथा बहू का बनाया हुआ और बेटी का परोसा हुआ भोजन आराधिका अपनी रनुबाई से माँगती है।

रनुबाई को संतान देने वाली देवी माना जाता है। संतान की प्रार्थना के लोकगीत गणगौर गीतों का वैशिष्ट्य है। इन गीतों में संतानहीन माता की पीड़ा के गीत इतने करुण हैं कि करुणा भी द्रवित हो पड़ती है। दुनिया के सम्पूर्ण सुख-ऐश्वर्य हो किन्तु संतान नहीं हो तो यह समृध्दि तुच्छ-सी जान पड़ती है। इन गीतों को वाँझुली गीत कहते है। एक वांझुली का अंश है-
अनS धनS भण्डारS भरयाS पूर्ण हो माताS
नई कोई भोगणS हारS
हो रनादेवी एक बाळुड़ो दीजेS
एकS बाळा का कारणS हो म्हारो जलमS अकारथS जाय
भावार्थ – घर में अन्न-धन के भण्डार भरे हैं पर कोई उसको भोगने वाला नहीं है। हे देवी एक संतान दे। संतान के बिना मेरा जीवन व्यर्थ है।

बाँझ शब्द समाज का दिया एक लांछित शब्द है। इस दर्द से छुटकारा चाहती है वंध्या, एक गीत का अंश है-
हो माताS बाँझS बाई बाँझS बाई सबयी कयS हो
नही कयS बाळा की मायS
एकS बाळुड़ो दS हो रना देवी मेटी दS बाँझS को नावS
एक बाळुड़ो थारो कळु मंS राखS नावS
भावार्थ – हे माता, सभी मुझे बाँझ कहते हैं, मुझे कोई बच्चे की माँ नहीं कहता है। हे देवी इस पीड़ा से मुक्ति दे। एक संतान दे ताकि मेरा बाँझ नाम मिटे और कलियुग में तेरे नाम की ख्याति हो।

ग्रामीणों का समूचा जीवन अपने खेतों, खलिहानों, कुआँ, बावड़ी के बीच और मुक्ताकाश के नीचे गुजरता है। ऐसी स्थिति में अगर वह देवी देवता के स्वरूप की कल्पना करता है, तो क्या अचरज है कि वह अपनी आराध्य देवी की सुन्दरता, उसके अंगों की उपमा अपनी खेती बाड़ी की फसलों से ही दे देता है। कितना सौन्दर्यबोध है इस गीत में –

थारो काई काई रूपऽ बखाणूऽ
थारी अँगळई मूँगऽ की सेंगळई रनुबाई
सोरठऽ देशऽ सी आई होऽ
थारा दातऽ दाड़िमऽ का बीजऽ रनुबाई
थारा डोळा लिम्बू की फाँकऽ रनुबाई
थारो सीसऽ नारेळरी रेखऽ
थारो भालऽ सूरिजमलऽ तेजऽ रनुबाई
थारा हाथऽ चम्पा का छोरऽ रनुबाई
थारा पाँय केळई का खम्बऽ रनुबाई

भावार्थ – हे रनुबाई! तेरे किस-किस स्वरूप का वर्णन करूँ? तेरे हाथ की उँगलियाँ मूँग की फली जैसे लम्बी और पोरदार नाजु़क हैं। हे देवी, तू सौराष्ट्र से आई है। तेरे दाँत अनार के बीजों जैसे सुन्दर चमकीले गठीले हैं। तेरी आँखें नीबू की फाँक जैसी रसीली हैं। तेरे हाथ चम्पा के छोर जैसे नाजु़क हैं और पैर कदली के खम्ब जैसे गठे सुगढ़ नरम हैं। हे माँ! तेरे भाल पर सूर्य का तेज है। मैं तेरे किस-किस रूप का वर्णन करूँ।

लोक कितनी सुन्दर उपमाओं से देवी के स्वरूप का वर्णन करता है। ऐसा वर्णन कहीं अन्यत्र कहीं देखने में नहीं आया है। लोक में सहज भक्ति का बड़ा निर्मल भाव है, हम जैसे हैं, वैसे हमारे भगवान् हैं। हम जैसे खाते हैं, जैसे रहते हैं, वैसे ही हमारे आराध्य करते हैं। रनुबाई और धणियर राजा को खीर-हलवा का प्रसाद नहीं लगाया जाता है। बल्कि सामान्य परिवारों में आसानी से उपलब्ध सामग्री का भोग लगाया जाता है। सच कहते हैं, भगवान् भावना के भूखे हैं। इसीलिए गणगौर माता का प्रसाद भी उसके साधक जुवार की धानी और मूँगफली का लगाते हैं, इसे ‘मेवा’ कहते हैं। जुवार और मूँगफली इस क्षेत्र की मुख्य पारम्परिक फसलें हैं।

प्रसाद के विषय पर एक और गीत का उल्लेख यहीं प्रासंगिक होगा। रनुबाई मैके से ससुराल आती है, तो ससुराल के लोग पूछते हैं कि तुम्हें क्या-क्या भोजन कराया, तब रनुबाई कहती हैं, ‘‘दाख-मेवा’ का भोजन कराया।’’ रनुबाई का उत्तर सुन, उनके साथ गया उनका देवर कहता है, ‘‘हे भावज्! झूठ मत बोलो, मूँगफली का प्रसाद और गुड़ घी भात का भोजन कराया गया था।’’ इस प्रसंग का एक गीत का अंश है –

झूठाऽ मति बोलो भावजऽ झूठा मति बोलोऽ
जुवारऽ की धानी नऽ भुई मूँग का मेवाऽ
चंदनऽ बाजुटऽ का बठणाऽ तुम्हाराऽ
गुड़ऽ भातऽ का जिमणाऽ तुम्हाराऽ
झूठाऽ मति बोलो….।
गणगौर गीतों में आम ग्रामीण के खानपान, रहन-सहन, रीति रिवाज का बड़ा उदात्त दर्शन होता है। जब बिदाई की जाती है, तो मार्ग में भूख से निजात के लिए बेटी के लिए भोजन के स्थान पर गेहूँ का आटा सेंककर, उसमें गुड़ मिलाकर, एक कपड़े की पोटली में रथ के भीतर रख दिया जाता है।

गणगौर माता के साथ लोक नौ दिन वैसा ही आनन्द मनाता है, जैसे कि ससुराल से मायके आई बेटी के साथ खुशियाँ मनाई जाती है। आठवें दिन जब कुरकई के जवारे लहलहाने लगते हैं, इन जवारा स्वरूप माता को धणियर राजा और रनुबाई के मानवाकृति रथ में बैठाकर गीत-नृत्य करके आनन्द उत्सव मनाया जाता है। इस अवसर पर झालरिया गीत गाये जाते हैं।
गीत-
धणियरS जी घोड़िला हिणS हिण्याS
रणुबाई करS सोळई सिंणगारS हो झालरियोS दS

गणगौर माता का रथ कोई विशाल आकार वाला आडम्बरपूर्ण सजावट का नहीं होता है। अपितु एक पाट पर मानवाकृति बनाकर उसपर मुखौटा लगाकर वस्त्र धारण करवाकर रथ बनाया जाता है। रनुबाई और धणियर राजा का शृंगार खेती-बाड़ी के फूल-फलों से किया जाता है। दूर्वा, अकाव के फूल, जुवार की धानी, मूँगफली और कैरियों के आभूषण बनाकर पहनाए जाते हैं।

जैसे गले मिलकर बेटी की विदाई करते हैं, वैसे ही भावपूर्ण होकर नौंवे दिन देवी रूप जवारों को भी विदाई दी जाती है। लोकगीत गाते हुए जवारों को जल में विसर्जित किया जाता है। अगले वर्ष फिर पीयर आने के लिए रनुबाई को सभी लोग विदा करते हैं।

रनुबाई की बिदाई के बाद गाँव के लोग अपने-अपने काम-धंधों में जुट जाते हैं। इसी अनुभूति का एक गीत है। जब रथ से ज्वारे विसर्जन कर लौटते हैं, तब यह गीत गाया जाता है –
रनुबाई तो सिधार्या सासरऽ
नऽ धंधा लाग्या लोगऽ हो सहेल्याँऽ
चलो सखी देखणऽ चाळाँऽ
धणियर राजा तो मोटऽ गेरऽ
नऽ रनुबाई पाणी वाळऽ हो सहेल्याँऽ
चलऽ सखी देखणऽ चाळाँऽ

भावार्थ – रनुबाई के पीहर आने पर निमाड़ का कृषक, लोक उनकी सेवा-भक्ति में लगा था। अब नौ दिन बाद उनकी बिदाई होने पर पूरा गाँव, लोग काम में लग गए। वहीं सहेलियाँ आपस में चर्चा करती हैं कि देखो देखें रणुबाई ससुराल में क्या कर रही हैं। इसी का भाव गीत है कि धणियर राजा मोट गेर कर कुएँ से पानी निकाल रहे हैं और रनुबाई फसल में पानी देने के लिए नालियाँ बना रही हैं।

जैसा लोक, वैसे उनके देवी-देवता। गणगौर का पर्व है और देवी उन्हें भक्ति, शक्ति, भुक्ति और मुक्ति देती हैं।


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