भेदभाव मन का विषय, व्यवहार में परिवर्तन से ही भेदभाव मिटेगा – डॉ. मोहन भागवत जी

देहरादून, 22 फरवरी।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में “संघ यात्रा – नए क्षितिज, नए आयाम” विषय पर प्रमुख जन गोष्ठी एवं विविध क्षेत्र समन्वित संवाद का आयोजन हिमालयन कल्चरल सेंटर के सभागार में हुआ। कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।


कार्यक्रम का शुभारंभ सरसंघचालक जी द्वारा भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पण एवं सामूहिक वंदेमातरम् गायन से हुआ।
प्रांत कार्यवाह दिनेश सेमवाल जी ने संघ शताब्दी वर्ष के अंतर्गत उत्तराखंड में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों – विजयादशमी पर पथ संचलन, घोष संचलन, व्यापक गृह संपर्क अभियान, परिवारों में प्रत्यक्ष संपर्क तथा हिन्दू सम्मेलनों की जानकारी दी तथा आगामी योजनाओं का भी विस्तार से उल्लेख किया।


“ऊपर से जो दिखता है, वह सदैव सत्य नहीं”


सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा कि संघ को बाहर से देखकर उसकी वास्तविकता को नहीं समझा जा सकता। पथ संचलन देखकर कुछ लोग उसे अर्धसैनिक संगठन समझ लेते हैं, राष्ट्रप्रेम के गीत सुनकर संगीत मंडली मान लेते हैं, सेवा कार्य देखकर सेवा क्षेत्र का संगठन समझ लेते हैं, किंतु संघ इन सीमाओं से परे एक व्यापक सामाजिक शक्ति है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे चीनी की मिठास को जानने के लिए उसे चखना पड़ता है, वैसे ही संघ को समझने के लिए संघ के कार्य में आना आवश्यक है।


उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं है। राष्ट्र सशक्त होगा तो राष्ट्रवासी भी सशक्त होंगे। यदि राष्ट्र दुर्बल होगा तो व्यक्ति अपने ही देश में सुरक्षित नहीं रह पाएगा। संघ का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है, क्योंकि सशक्त व्यक्ति से ही सशक्त समाज और राष्ट्र का निर्माण होता है।


संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि वे जन्मजात देशभक्त और विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। बाल्यकाल में महारानी विक्टोरिया के जन्मदिवस पर विद्यालय में वितरित मिठाई लेने से उन्होंने यह कहकर इंकार कर दिया था कि वे अपने देश पर शासन करने वाले के उत्सव में भाग नहीं लेंगे। वे अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य रहे तथा वंदेमातरम् बोलने के कारण स्कूल से निष्कासन भी झेला। उनका संकल्प था कि भारत बार-बार पराधीन न हो, इसी उद्देश्य से संघ की स्थापना की गई।


सरसंघचालक जी ने कहा कि लम्बी ऐतिहासिक यात्रा के पश्चात आज विश्व भारत को पुनः नेतृत्वकारी भूमिका में देखने की आशा कर रहा है। उपस्थित जनसमूह से संघ की गतिविधियों से जुड़कर समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने का आह्वान किया। संघ के “पंच परिवर्तन” सिद्धांतों के माध्यम से भारत को परम वैभव तक ले जाने का संकल्प लेने का आग्रह किया।


प्रश्नोत्तर सत्र – भेदभाव और सामाजिक परिवर्तन


उन्होंने कहा कि सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव का मूल कारण व्यवस्था नहीं, बल्कि मन है। अंधकार को पीटने से नहीं, प्रकाश जलाने से समाप्त किया जाता है। व्यवहार में परिवर्तन से ही भेदभाव मिटेगा। संघ में कई स्वयंसेवक दशकों तक कार्य करते हैं, पर पहचान की अपेक्षा नहीं रखते क्योंकि कार्य ही प्रधान है।


डिजिटल युग पर कहा कि तकनीक साधन है, साध्य नहीं। उसका उपयोग संयम और अनुशासन से होना चाहिए। परिवार में आत्मीयता और समय देना आवश्यक है; तकनीक के लिए मनुष्य की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती।


उन्होंने कहा कि जो जोड़ने का कार्य करे, वही हिन्दू है। मातृभूमि के प्रति भक्ति अनिवार्य है। विश्व सत्य से अधिक शक्ति को समझता है, इसलिए शक्ति अर्जित करना आवश्यक है, किंतु उसका उपयोग मर्यादित होना चाहिए।


महिलाएं पूर्णतः स्वतंत्र हैं। देश संचालन में उनकी भागीदारी 33 प्रतिशत ही नहीं, 50 प्रतिशत तक होनी चाहिए। प्रतिबंध काल में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।


पर्यावरण, शिक्षा और सामाजिक सद्भाव


उत्तराखंड की नदियों और पर्यावरण संरक्षण पर उन्होंने समन्वित नीति और स्थानीय सहभागिता पर बल दिया। शिक्षा में पाठ्यक्रम से अधिक शिक्षकों के संस्कारों को महत्वपूर्ण बताया। आरक्षण, वर्गीकरण और समान नागरिक संहिता जैसे विषयों पर कहा कि समाज को प्रामाणिकता और सद्भाव से कार्य करना चाहिए। विभाजन की मानसिकता से बाहर आना होगा।


उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ हिन्दुत्व की राजनीति नहीं करता, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज उत्थान का कार्य करता है। भ्रष्टाचार मन से प्रारंभ होता है और वहीं समाप्त किया जा सकता है।


जनसंख्या को उन्होंने बोझ और संसाधन – दोनों दृष्टियों से देखने की आवश्यकता बताई तथा समान रूप से लागू होने वाली विचारपूर्ण नीति पर बल दिया।


कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के प्रबुद्धजन, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद्, उद्योग जगत से जुड़े प्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में स्वयंसेवक उपस्थित रहे। कार्यक्रम राष्ट्रगान के साथ सम्पन्न हुआ।


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