
जऊलके (ता. दिंडोरी, जि. नासिक), 10 फरवरी।
जऊलके स्थित आर्मस्ट्रांग रोबोटिक्स एंड टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड में आयोजित शिक्षा संस्थानों के प्रमुखों से स्नेह संवाद कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि “एक संवेदशील मनुष्य के निर्माण की प्रक्रिया में शिक्षा की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। गुणवत्तापूर्ण समाज शिक्षा के माध्यम से ही बनता है और ऐसा परिपक्व समाज ही राष्ट्र को बलशाली बनाता है। इसलिए, शिक्षकों को इस पवित्र कार्य को केवल आजीविका के रूप में नहीं, बल्कि आत्मीयता से करना चाहिए”।
संघ शताब्दी के उपलक्ष्य में आयोजित अनौपचारिक वार्ता कार्यक्रम में पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत के संघचालक नाना जाधव और विभाग संघचालक नाना साळुंखे भी उपस्थित रहे। सरसंघचालक जी ने कहा कि “शिक्षा केवल व्यापार या अर्थव्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह छात्रों में मानवता का सृजन करने का प्रयास होता है। शिक्षकों को अपने अंदर के ‘गुरु’पन को खोने नहीं देना चाहिए। विद्यालय के प्रत्येक घटक को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता होती है, तथा शिक्षा संस्थानों के प्रमुखों को शिक्षकों में कार्य के प्रति आत्मीयता की भावना उत्पन्न करनी चाहिए”।
उन्होंने अपने प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों का उदाहरण देते हुए समझाया कि शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच घनिष्ठ संबंध कितना महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि “संघ न तो कोई प्रतिक्रिया है, न प्रतिस्पर्धा है और न ही सत्ता का बल है। संघ का उद्देश्य देश को महान बनाना और समाज की एकता को बढ़ाना है। संघ पिछली शताब्दी से ही अनुशासित और लक्ष्य-उन्मुख समाज के निर्माण का प्रयास कर रहा है। संघ को समझने के लिए सभी को एक बार संघ में अवश्य आना चाहिए”।
संस्कृति ही समाज का स्वभाव
समाज के 80 प्रतिशत लोग अनुकरण के माध्यम से सीखते हैं, यह बताते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि “यद्यपि हमारे देश में अनेक भाषाएं और संप्रदाय हैं, फिर भी ‘संस्कृति’ हमारे समाज का स्वभाव होना चाहिए। वल्लभभाई पटेल और सुभाषचंद्र बोस ने देश के प्रति जो समर्पण किया, वही समर्पण भाव आज की पीढ़ी में भी जगाना शिक्षा क्षेत्र का दायित्व है”।